प्रिज़न सिस्टम में कैदियों के मानवाधिकार: रेफॉर्म, चुनौतियाँ और न्यायिक हस्तक्षेप
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https://doi.org/10.8224/journaloi.v74i2.968##semicolon##
कैदी अधिकार##common.commaListSeparator## जेल सुधार##common.commaListSeparator## न्यायिक हस्तक्षेप##common.commaListSeparator## मानवाधिकार##common.commaListSeparator## मॉडल प्रिज़न एक्ट 2023##common.commaListSeparator## पुनर्वास##common.commaListSeparator## नेल्सन मंडेला नियमसार
यह शोध पत्र भारतीय प्रिज़न सिस्टम में कैदियों के मानवाधिकारों, जेल सुधारों, न्यायिक हस्तक्षेप और वर्तमान चुनौतियों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्रस्तावना में जेलों में भीड़-भाड़, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और अमानवीय व्यवहार जैसी समस्याओं को लेकर चिंता जताई गई है, जो कैदियों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 22 तक कैदियों के अधिकारों का संवैधानिक आधार प्रदान करते हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने अनेक निर्णयों द्वारा पुष्टि की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, नेल्सन मंडेला नियम जैसे मानदंड कैदियों के सम्मानजनक और सुरक्षित व्यवहार के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुए हैं। भारतीय जेलों की संरचना केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के अधीन है, जिसमें भीड़-भाड़, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं प्रमुख हैं। साथ ही महिला, ट्रांसजेंडर और मानसिक रोगी कैदियों की विशेष आवश्यकताओं की उपेक्षा एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में सामने आई है। कैदियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन जैसे यौन उत्पीड़न, यातना तथा कानूनी सहायता की असुलभता जेल व्यवस्था की बड़ी समस्याएं हैं। लंबित मामलों के कारण कैदियों की स्थिति अनिश्चित और दयनीय बनी रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने सनिल बत्रा केस, कृष्णन केस तथा तुकराम केस जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों में जेलों में मानवीय सुधारों और अधिकार संरक्षण का आदेश दिया है। सरकार द्वारा प्रस्तावित मॉडल प्रिज़न एक्ट, 2023 जेल सुधारों में क्रांतिकारी बदलाव लाने की कोशिश है जो कैदियों के पुनर्वास, सुरक्षा, चिकित्सा, तथा कानूनी सहायता सुनिश्चित करता है। खुले जेल, तकनीकी सुधार और व्यावसायिक प्रशिक्षण पुनर्वास के प्रमुख पहलू हैं। हालांकि सुधारों में अधोसंरचना की कमी, बजट सीमाएँ, सिस्टम में भ्रष्टाचार और सामाजिक मानसिकता सुधारों में बाधक हैं। बेहतर प्रिज़न प्रबंधन के लिए मानवाधिकार आधारित दृष्टिकोण, न्यायिक प्रक्रिया में तीव्रता और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। भारतीय प्रिज़न प्रणाली के सुधार हेतु न्यायपालिका, प्रशासन और समाज का समन्वित प्रयास आवश्यक है ताकि जेलें दंड केंद्र होने के बजाय सुधार और पुनर्वास के प्रभावी केंद्र बन सकें जिससे कैदियों के अधिकारों का सम्मान हो और वे समाज में सकारात्मक योगदान दे सकें।



