रोशनआरा बेग़म की ठुमरी एवं ग़ज़ल में भावाभिव्यक्ति : किराना घराने की स्वरप्रधान परंपरा के आलोक में

Authors

  • जसप्रीत कौर and डॉ. अमनदीप सिंह मक्कर

DOI:

https://doi.org/10.8224/journaloi.v75i1.1110

Abstract

 

 

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा में किराना घराना अपनी विशिष्ट स्वर-साधना, सूक्ष्म श्रुति-बोध, दीर्घ स्वर-विस्तार, मींडप्रधान गायकी तथा स्वर की अंतःस्पंदनात्मक अभिव्यक्ति के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। इस घराने की गायकी में स्वर केवल संगीतात्मक संरचना का एक घटक नहीं, बल्कि भाव-संप्रेषण का मूल माध्यम बन जाता है। स्वर के सूक्ष्म आरोह-अवरोह, कण, मींड, आंदोलित स्वर तथा विलंबित लय में स्वर-विस्तार के माध्यम से कलाकार रागात्मक अनुभूति को ऐसी भाव-सघनता प्रदान करता है, जिसमें शब्द गौण होकर भी अर्थ की गहनतर अनुभूति का माध्यम बन जाते हैं। इसी स्वरप्रधान परंपरा के संदर्भ में रोशनआरा  बेगम का गायन विशेष अध्ययन की अपेक्षा रखता है।

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Published

2000

How to Cite

जसप्रीत कौर and डॉ. अमनदीप सिंह मक्कर. (2026). रोशनआरा बेग़म की ठुमरी एवं ग़ज़ल में भावाभिव्यक्ति : किराना घराने की स्वरप्रधान परंपरा के आलोक में. Journal of the Oriental Institute, ISSN:0030-5324 UGC CARE Group 1, 75(1), 300–311. https://doi.org/10.8224/journaloi.v75i1.1110

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