रोशनआरा बेग़मकी ठुमरी एवं ग़ज़ल में भावाभिव्यक्ति : किराना घराने की स्वरप्रधान परंपरा के आलोक में

Authors

  • जसप्रीत कौर , डॉ. अमनदीप सिंह मक्कर

DOI:

https://doi.org/10.8224/journaloi.v75i1.1109

Keywords:

रोशनआरा बेगम, ककराना घराना, ठुमरी, ग़ज़ल, भावाभभव्यक्ति, स्वरप्रधान गायकी, मींड, बोल-बनाव, स्वर-सौंर्दय

Abstract

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा में किराना घराना अपनी विशिष्ट स्वर-साधना, सूक्ष्म श्रुति-बोध, दीर्घ स्वर-विस्तार, मीडप्रधान गायकी तथा स्वर की अंतःस्पंदनात्मक अभिव्यक्ति के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। इस घराने की गायकी में स्वर केवल संगीतात्मक संरचना का एक घटक नहीं, बल्कि भाव-संप्रेषण का मूल माध्यम बन जाता है। स्वर के सूक्ष्म आरोह-अवरोह, कण, मींड, आंदोलित स्वर तथा विलंबित लय में स्वर-विस्तार के माध्यम से कलाकार रागात्मक अनुभूति को ऐसी भाव-सघनता प्रदान करता है, जिसमें शब्द गौण होकर भी अर्थ की गहनतर अनुभूति का माध्यम बन जाते हैं। इसी स्वरप्रधान परंपरा के संदर्भ में रोशनआरा बेगम का गायन विशेष अध्ययन की अपेक्षा रखता है। रोशनआरा बेगम का संबंध किराना घराने की समृद्ध सांगीतिक परंपरा से रहा है। उनके गायन में घराने की स्वर-साधना के साथ-साथ उपशास्त्रीय संगीत की भावप्रधान परंपरा का विशिष्ट समन्वय दिखाई देता है। ठुमरी और ग़ज़ल जैसी शैलियों में जहाँ शब्द, काव्यात्मक अर्थ, प्रेम, विरह, करुणा, अनुराग तथा अंतर्मुखी संवेदना की प्रमुख भूमिका होती है, वहीं रोशनआरा बेगम की प्रस्तुति में स्वर उन भार्वो को अनुभूति के अधिक सूक्ष्म स्तर तक ले जाता है। इस दृष्टि से उनकी गायकी का अध्ययन केवल शैलीगत विश्लेषण नहीं, बल्कि स्वर और भाव के पारस्परिक संबंध की खोज भी है

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Published

2000

How to Cite

जसप्रीत कौर , डॉ. अमनदीप सिंह मक्कर. (2026). रोशनआरा बेग़मकी ठुमरी एवं ग़ज़ल में भावाभिव्यक्ति : किराना घराने की स्वरप्रधान परंपरा के आलोक में. Journal of the Oriental Institute, ISSN:0030-5324 UGC CARE Group 1, 75(1), 300–310. https://doi.org/10.8224/journaloi.v75i1.1109

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