विकसित भारत में साहित्य की भूमिका

Authors

  • राम सुधि
  • डॉ. यतेन्द्र सिंह कुशवाहा

DOI:

https://doi.org/10.8224/journaloi.v72i3.1106

Abstract

विकसित भारत की संकल्पना स्थूल आर्थिक संवृद्धि अथवा अत्याधुनिक अवसंरचनात्मक विकास के संख्यात्मक विस्तार तक सीमित नहीं है, यह विस्तृत, गहन सभ्यतागत पुनर्जागरण का नव-अभिव्यक्ति है। साहित्य, इस नवनिर्माण और परिष्कार की प्रक्रिया में एक प्रेरणादायी अन्तःमुखी संस्कारकारी ऊर्जा के रूप में सक्रिय है। साहित्य विकास के भौतिक प्रतिमानों को नैतिक अधिष्ठान, संवेदनात्मक गरिमा और संधारणीयता के साथ ही समावेशिता प्रदान करता है। जहाँ तकनीकी प्रगति समाज को यांत्रिकता उन्मुख जोखिम उत्पन्न करती है, वहीं साहित्य मानवीय विवेक और करुणा के बीज-तत्वों के मध्य मनुष्य को मनुष्यता पूर्ण जीवन की ओर उत्प्रेरित करता है।

इस वैचारिक ढांचे में साहित्य प्राचीन प्रज्ञा और आधुनिक नवोन्मेष के मध्य द्वंद्वात्मक संतुलन स्थापित कर जनमानस को पूर्ण उपभोक्तावाद की कंचुकी त्यागकर स्वत्व के बोध को जागृत करता है। साहित्यिक अभिव्यक्ति विकास की मुख्यधारा से ओझल हुए हाशियाग्रस्त स्वरों को मुखर कर प्रगति को समावेशी, न्यायसंगत और सतत बनाती है। विकसित भारत तभी अपनी पूर्णता और प्रभाविता की प्रज्वलित मशाल बन सकेगा, जब वह अस्मिताओं के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व, संधारणीयता और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की वैश्विक नैतिकता से अनुप्राणित हो तथा 'विश्व गुरु' के अलंकरण प्राप्ति की ओर अग्रसर हो।

Author Biographies

राम सुधि

हिन्दी विभाग, डी. ए–वी. कॉलेज, कानपुर , संबद्ध- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर

डॉ. यतेन्द्र सिंह कुशवाहा

हिन्दी विभाग, डी. ए–वी. कॉलेज, कानपुर , संबद्ध- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर

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Published

2000

How to Cite

राम सुधि, & डॉ. यतेन्द्र सिंह कुशवाहा. (2023). विकसित भारत में साहित्य की भूमिका. Journal of the Oriental Institute, ISSN:0030-5324 UGC CARE Group 1, 72(3), 202–214. https://doi.org/10.8224/journaloi.v72i3.1106

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Articles