“ हिन्दी साहित्य में आदिवासी स्वर : एक चिन्तन ”
DOI:
https://doi.org/10.8224/journaloi.v74i1.723Abstract
हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श एवं दलित-विमर्श के बाद एक नया विमर्श हमें देखने को मिलता वह है, आदिवासी विमर्श | आदिवासी विमर्श आदिवासियों के लिये अस्मितावादी विमर्श है | वास्तविक रूप से देखा जाये तो आदिवासियों के प्रति नफरत व उनके अधिकारों के प्रति जागरूक,सजग न करने का अधिकतर कार्य किसी ने किया है तो उन क्षेत्रवासियों / रहवासियों / शरणार्थियों ने किया हैं | एक वह समय था जब आदिवासी अपने स्वयं की भूमि पर खेती करके अपना जीवन - यापन कर रहा था | जिन आदिवासियों के बदौलत पूरे भारत वर्ष की कृषि एवं कृषि के सहायक उधोग-धंधों से ही सम्पूर्ण भारत की अर्थव्यवस्था निर्भर करती थी | लेकिन आज आदिवासियों के हाथों से यह अर्थव्यवस्था की भागीदारी निकल चुकी है |
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Published
2000
How to Cite
डॉ. कांतिलाल यादव and श्री हरिप्रकाश परमार. (2025). “ हिन्दी साहित्य में आदिवासी स्वर : एक चिन्तन ”. Journal of the Oriental Institute, ISSN:0030-5324 UGC CARE Group 1, 74(1), 570–575. https://doi.org/10.8224/journaloi.v74i1.723
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Articles