हिन्दी समीक्षा : सौन्दर्य विषयक अवधारणा
Abstract
प्राकृतिक देवोपासक आर्य मनीषियों ने अपने मंत्र दर्शन में चिर सुन्दर सत्य की खोज करके भारतीय सौन्दर्य दृष्टि का उद्घाटन किया है। भारतीय सिंतन में पश्चिमी सौन्दर्यशास्त्र की भाँति किसी पृथक शास्त्र की परिकल्पना नहीं की गई है, किन्तु नाटक, संगीत, चित्रादि ललित कलाओं के अंतर्गत व्यष्टि से समष्टि की प्रक्रिया में लावण्य, रम्य, रमणीय, सुन्दर आदि शब्द प्रयोगों से सौन्दर्य तत्व की व्यापकता को स्वीकार किया है। कलाकार के अभ्यान्तर संस्कार की सुगन्ध के रूप में रमणीयार्थ प्रतिपादक शब्द, उक्ति की वक्रता, अलंकार सौष्ठव से विषयीगत सौन्दर्य और इससे भी ऊपर अप्रतिम सौन्दर्य का अनुभव भारतीय कवियों, आचार्यों ने किया है।
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Published
2000
How to Cite
डॉ. राधा भारद्वाज. (2026). हिन्दी समीक्षा : सौन्दर्य विषयक अवधारणा. Journal of the Oriental Institute, ISSN:0030-5324 UGC CARE Group 1, 70(1), 193–197. Retrieved from https://journaloi.com/index.php/JOI/article/view/1080
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